International Journal of Technology and Applied Science
E-ISSN: 2230-9004
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Volume 17 Issue 2
February 2026
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थार रेगिस्तान: राजस्थान में भू-आकृति विज्ञान और मरुस्थलीकरण — एक भौगोलिक अध्ययन
| Author(s) | Sharvan Kumar Meena |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | थार रेगिस्तान, जिसे सामान्यतः “भारत का महान मरुस्थल” कहा जाता है, न केवल भारत बल्कि सम्पूर्ण दक्षिण एशिया का एक प्रमुख शुष्क भौगोलिक क्षेत्र है। यह रेगिस्तान लगभग 200,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है, जिसका अधिकांश भाग राजस्थान के पश्चिमी जिलों—जैसे जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, चूरू और श्रीगंगानगर—में स्थित है। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि यहाँ की जलवायु, स्थलाकृति, मिट्टी की प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता अन्य भारतीय भौगोलिक प्रदेशों से भिन्न दिखाई देती है। थार रेगिस्तान की पहचान इसकी अल्प वर्षा, अत्यधिक तापमान, तीव्र वाष्पीकरण, रेतीले मैदानों और गतिशील बालू-टीलों से होती है, जो इस क्षेत्र की भौतिक संरचना को निरंतर परिवर्तित करते रहते हैं। थार क्षेत्र की जलवायु मुख्यतः शुष्क एवं अर्ध-शुष्क है, जहाँ औसत वार्षिक वर्षा बहुत कम होती है और वह भी अत्यधिक अनिश्चित रहती है। मानसूनी वर्षा का वितरण असमान होने के कारण जल-संसाधनों की समस्या यहाँ सदैव बनी रहती है। गर्मियों में तापमान 45°–50° सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जबकि सर्दियों में रात्रिकालीन तापमान अत्यंत निम्न हो सकता है। इन चरम जलवायु परिस्थितियों ने न केवल प्राकृतिक पर्यावरण को प्रभावित किया है, बल्कि मानव जीवन, कृषि पद्धतियों, पशुपालन और बसावटों की प्रकृति को भी विशेष रूप से ढालने का कार्य किया है। भू-आकृति विज्ञान की दृष्टि से थार रेगिस्तान का विकास विभिन्न भू-गर्भीय कालखंडों में हुआ है। यहाँ पाए जाने वाले रेत के टीले, समतल मैदान, शुष्क नदी घाटियाँ, प्लाया झीलें तथा अवसादी संरचनाएँ इस क्षेत्र में पवन क्रियाओं, जलवायु परिवर्तन और भू-गर्भीय प्रक्रियाओं की दीर्घकालिक भूमिका को दर्शाती हैं। अरावली पर्वतमाला की स्थिति और उसकी दिशा ने भी थार के विस्तार और जलवायु पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। इन भू-आकृतिक विशेषताओं के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि थार रेगिस्तान केवल एक स्थिर भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह निरंतर परिवर्तनशील प्राकृतिक प्रणाली है। वर्तमान समय में थार रेगिस्तान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौगोलिक मुद्दा मरुस्थलीकरण है। मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत उपजाऊ अथवा अर्ध-उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे अपनी उत्पादक क्षमता खोकर शुष्क एवं बंजर रूप धारण कर लेती है। थार क्षेत्र में यह प्रक्रिया प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानवजनित गतिविधियों—जैसे अत्यधिक चराई, वनों की कटाई, अनियंत्रित सिंचाई, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन और अनुपयुक्त कृषि पद्धतियों—के कारण तीव्र होती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी का क्षरण, जैव विविधता में कमी, जल संकट और ग्रामीण आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य थार रेगिस्तान की उत्पत्ति एवं विकास से जुड़े भू-आकृतिक कारकों का गहन अध्ययन करना तथा मरुस्थलीकरण की प्रक्रियाओं, कारणों और प्रभावों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करना है। साथ ही, यह अध्ययन राजस्थान के संदर्भ में मरुस्थलीकरण के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों को समझने का प्रयास करता है। प्रस्तुत शोध न केवल शुष्क प्रदेशों की भौगोलिक समझ को समृद्ध करता है, बल्कि सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से नीति-निर्माण एवं क्षेत्रीय योजना के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। 2. क्षेत्र का भौगोलिक अवस्थिति थार रेगिस्तान भारत के पश्चिमी भाग में स्थित एक विशाल शुष्क भौगोलिक प्रदेश है, जो राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर भौगोलिक महत्त्व रखता है। इसका विस्तार भारत–पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों ओर पाया जाता है, जहाँ भारत में इसका प्रमुख भाग राजस्थान राज्य में तथा पाकिस्तान में सिंध और पंजाब के कुछ क्षेत्रों में फैला हुआ है। भारतीय थार रेगिस्तान का अधिकांश क्षेत्र राजस्थान के पश्चिमी एवं उत्तर-पश्चिमी जिलों—जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, चूरू, सूरतगढ़ तथा श्रीगंगानगर—में स्थित है, जो इसे राज्य की भौगोलिक संरचना का एक प्रमुख अंग बनाता है। अक्षांश–देशांतर की दृष्टि से थार रेगिस्तान लगभग 24° से 29° उत्तर अक्षांश तथा 70° से 75° पूर्व देशांतर के बीच विस्तृत है। यह भौगोलिक स्थिति इसे कर्क रेखा के निकट स्थित एक उष्णकटिबंधीय शुष्क क्षेत्र के रूप में स्थापित करती है। इसकी पश्चिमी सीमा पाकिस्तान के मरुस्थलीय क्षेत्रों से मिलती है, जबकि पूर्व की ओर यह धीरे-धीरे अर्ध-शुष्क मैदानों में परिवर्तित हो जाता है। दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान की एक प्राकृतिक सीमा का कार्य करती है। अरावली की दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में फैली श्रृंखला मानसूनी पवनों को अवरुद्ध कर देती है, जिसके कारण थार क्षेत्र में वर्षा अत्यंत कम होती है। थार रेगिस्तान की भौगोलिक अवस्थिति ने इसकी जलवायु, स्थलाकृति और प्राकृतिक संसाधनों पर गहरा प्रभाव डाला है। यहाँ की स्थिति मानसूनी पवनों की पहुँच से अपेक्षाकृत दूर होने के कारण वर्षा सीमित और अनिश्चित रहती है। औसतन वर्षा 100 से 400 मिमी के बीच होती है, जो पश्चिम से पूर्व की ओर धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। इसी अक्षांशीय स्थिति के कारण यहाँ गर्मियों में तीव्र तापमान और सर्दियों में अपेक्षाकृत ठंडे मौसम का अनुभव होता है। दिन और रात के तापमान में अधिक अंतर इस क्षेत्र की प्रमुख जलवायु विशेषता है। भौगोलिक दृष्टि से थार का यह स्थान इसे उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिकी एवं मानव गतिविधियों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाता है। सीमावर्ती स्थिति होने के कारण यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से भी संवेदनशील है, वहीं दूसरी ओर इसकी अवस्थिति ने यहाँ विशिष्ट कृषि-पद्धतियों, पशुपालन प्रणालियों और बस्तियों के विकास को प्रभावित किया है। इस प्रकार, थार रेगिस्तान की भौगोलिक अवस्थिति न केवल इसके प्राकृतिक पर्यावरण को आकार देती है, बल्कि मानव जीवन और आर्थिक गतिविधियों की संरचना को भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। 3. थार रेगिस्तान का भू-आकृति विज्ञान 3.1 भू-आकृतिक स्वरूप भू-आकृतिक (Geomorphological) दृष्टि से थार रेगिस्तान एक अत्यंत जटिल और गतिशील भू-दृश्य प्रस्तुत करता है। यह क्षेत्र मुख्यतः अवसादी मैदानों, रेतीले टीलों और पवन-निर्मित संरचनाओं से युक्त है, जिनका विकास दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तनों, पवन क्रियाओं तथा सीमित जल प्रवाह के परिणामस्वरूप हुआ है। थार का भू-आकृतिक स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि यह क्षेत्र केवल स्थिर रेत का विस्तार नहीं है, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील भौगोलिक प्रणाली है। थार रेगिस्तान में सर्वाधिक प्रमुख भू-आकृतिक तत्व रेत के टीले (Sand Dunes) हैं। ये टीले आकार, ऊँचाई और दिशा की दृष्टि से विविधता प्रदर्शित करते हैं। अधिकांश टीले गतिशील प्रकृति के होते हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से “चलायमान बालू-टीले” कहा जाता है। पवन की तीव्रता और दिशा में परिवर्तन के कारण ये टीले समय-समय पर अपना स्थान बदलते रहते हैं, जिससे कृषि भूमि, सड़कें और बस्तियाँ प्रभावित होती हैं। कुछ क्षेत्रों में अनुदैर्ध्य (Longitudinal), अनुप्रस्थ (Transverse) तथा अर्धचंद्राकार (Barchan) टीलों का स्पष्ट विकास देखा जा सकता है। थार रेगिस्तान के कुछ भागों में बढ़ी रेत या एर्ग (Erg forms) पाई जाती है, जो विस्तृत रेत-समुद्र के समान प्रतीत होती है। ये विशाल रेत-रिज़ और टीले प्रायः उन क्षेत्रों में विकसित हुए हैं जहाँ पवन की क्रिया दीर्घकाल तक प्रभावी रही है और सतही जल का अभाव रहा है। एर्ग स्वरूप यह संकेत देते हैं कि अतीत में यहाँ अत्यधिक शुष्क जलवायु की स्थिति विद्यमान रही होगी, जिसने व्यापक पैमाने पर रेत संचयन को प्रोत्साहित किया। रेत के टीलों के बीच पाए जाने वाले बखाड़ा अथवा इंटरड्यूनल क्षेत्र (Interdunal Areas) अपेक्षाकृत समतल होते हैं। इन क्षेत्रों में कहीं-कहीं पथरीली सतह, कहीं महीन मिट्टी तथा कहीं-कहीं लवणीय परतें पाई जाती हैं। ये क्षेत्र मानव बसावट और कृषि गतिविधियों के लिए अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त माने जाते हैं, क्योंकि यहाँ रेत की गहराई कम होती है और सीमित मात्रा में नमी संचित हो सकती है। पारंपरिक जल-संरक्षण संरचनाएँ जैसे कुंड और तालाब प्रायः इन्हीं क्षेत्रों में विकसित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त थार रेगिस्तान में लूप अथवा लोएस (Loess deposits) की पतली परतें भी मिलती हैं, जो मुख्यतः पवन द्वारा लाए गए महीन कणों के जमाव से बनी होती हैं। ये परतें कहीं-कहीं कृषि की दृष्टि से अपेक्षाकृत उपजाऊ सिद्ध होती हैं और यह दर्शाती हैं कि थार में केवल मोटे रेत-कण ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म अवसादी पदार्थों का भी संचयन हुआ है। समग्र रूप से, थार रेगिस्तान के ये सभी भू-आकृतिक स्वरूप मुख्यतः पवन की क्रियाशीलता (Aeolian Processes) का परिणाम हैं। उष्णकटिबंधीय शुष्क जलवायु में बहने वाली तेज़ मौसमी पवनें रेत और धूल कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाकर निरंतर भू-दृश्य का पुनर्गठन करती रहती हैं। इस प्रक्रिया में कहीं क्षरण (Erosion) तो कहीं निक्षेपण (Deposition) होता है, जिससे थार का भू-आकृतिक स्वरूप सदैव परिवर्तनशील बना रहता है। 3.2 तलछट और मिट्टी का स्वरूप थार रेगिस्तान की मिट्टी और तलछट की प्रकृति उसके भू-आकृतिक विकास और जलवायु परिस्थितियों का प्रत्यक्ष परिणाम है। यहाँ पाई जाने वाली मिट्टियाँ सामान्यतः अवसादी उत्पत्ति की हैं, जिनका निर्माण पवन तथा सीमित जल क्रियाओं द्वारा हुआ है। थार के अधिकांश भाग में मुख्यतः दो प्रकार की मिट्टियाँ विकसित हुई हैं। पहली प्रमुख मिट्टी रेतीली मिट्टी (Sandy Soil) है, जो थार रेगिस्तान का विशिष्ट लक्षण मानी जाती है। यह मिट्टी हल्की, छिद्रयुक्त तथा कम संगठित होती है। इसकी जल-धारण क्षमता सीमित होती है, जिसके कारण वर्षा का जल शीघ्र ही नीचे रिस जाता है या वाष्पीकरण द्वारा नष्ट हो जाता है। इस मिट्टी में जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों की मात्रा कम होती है, जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके बावजूद, उचित जल-संरक्षण तकनीकों और उन्नत कृषि पद्धतियों के माध्यम से इस मिट्टी में बाजरा, ज्वार और दालों जैसी फसलें उगाई जाती हैं। दूसरी प्रकार की मिट्टी क्लेय अथवा सिल्ट मिश्रित मिट्टी (Clay/Silt Soil) है, जो थार के कुछ समतल मैदानों, पुराने नदी-पथों और इंटरड्यूनल क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मिट्टी अपेक्षाकृत अधिक सघन होती है और इसकी जल-धारण क्षमता रेतीली मिट्टी की तुलना में अधिक होती है। परिणामस्वरूप, इन क्षेत्रों में कृषि की संभावनाएँ अपेक्षाकृत बेहतर होती हैं। कुछ स्थानों पर लवणीयता और क्षारीयता की समस्या भी पाई जाती है, जो सिंचाई और भूमि उपयोग को प्रभावित करती है। थार रेगिस्तान की भू-आकृतिक विशेषताएँ और मिट्टी का स्वरूप यहाँ के जल-वायु तंत्र से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। अल्प वर्षा, उच्च तापमान और तीव्र पवनें मिट्टी के क्षरण को बढ़ावा देती हैं, जिससे भूमि की उर्वरता निरंतर घटती जाती है। इस प्रकार, भू-आकृति विज्ञान और मिट्टी की प्रकृति न केवल थार रेगिस्तान के प्राकृतिक पर्यावरण को परिभाषित करती है, बल्कि जल संसाधनों, कृषि संभावनाओं और मानव जीवन की दशा-दिशा को भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। 4. मरुस्थलीकरण (Desertification): सिद्धांत, कारण व प्रक्रिया 4.1 मरुस्थलीकरण की परिभाषा मरुस्थलीकरण एक जटिल एवं बहुआयामी जैव–भौतिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत शुष्क, अर्ध-शुष्क तथा उप-आर्द्र क्षेत्रों की भूमि धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक उत्पादकता खो देती है और वह रेगिस्तानी या बंजर स्वरूप ग्रहण कर लेती है। यह प्रक्रिया केवल वर्षा की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, भू-आकृतिक असंतुलन, जैविक तंत्र के क्षरण तथा मानवजनित गतिविधियों के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न होती है। मरुस्थलीकरण के दौरान मिट्टी की उर्वरता घटती है, वनस्पति आवरण नष्ट होता है, जल संसाधन सिकुड़ते हैं और भूमि का उपयोग कृषि अथवा चारागाह के रूप में कठिन हो जाता है। थार रेगिस्तान जैसे शुष्क प्रदेशों में मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तीव्र होती है, क्योंकि यहाँ की प्राकृतिक परिस्थितियाँ पहले से ही नाजुक संतुलन पर आधारित हैं। थोड़े से भी पर्यावरणीय अथवा मानवीय दबाव से यह संतुलन बिगड़ जाता है और भूमि तेजी से अनुपजाऊ होने लगती है। 4.2 थार में मरुस्थलीकरण के कारण थार रेगिस्तान में मरुस्थलीकरण के कारणों को मुख्यतः प्राकृतिक तथा मानवजनित दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, जो परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। (क) प्राकृतिक कारण थार क्षेत्र में मरुस्थलीकरण का प्रमुख प्राकृतिक कारण अल्प एवं अनिश्चित वर्षा है। इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 100 से 400 मिमी के बीच होती है, जो स्थान और समय के अनुसार अत्यंत असमान रूप से वितरित रहती है। कभी-कभी लगातार कई वर्षों तक सूखा पड़ने से भूमि की नमी समाप्त हो जाती है और मिट्टी का क्षरण तीव्र हो जाता है। इसके साथ ही उच्च तापमान भी मरुस्थलीकरण को बढ़ावा देता है। गर्मियों में तापमान 45° से 50° सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जिससे वाष्पीकरण की दर अत्यधिक बढ़ जाती है और उपलब्ध नमी शीघ्र नष्ट हो जाती है। परिणामस्वरूप वर्षा और वाष्पीकरण के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। थार क्षेत्र में चलने वाली शुष्क एवं तीव्र मौसमी पवनें भी मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये पवनें सतह की महीन मिट्टी और रेत को उड़ा ले जाती हैं, जिससे भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत नष्ट हो जाती है और नए रेत-टीले विकसित होते हैं। इसके अतिरिक्त, भू-गर्भिक परिस्थितियाँ भी मरुस्थलीकरण को प्रभावित करती हैं। सतही जल स्रोतों का अभाव, भूजल का गहरा स्तर तथा मिट्टी की कम जल-धारण क्षमता इस क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से अधिक संवेदनशील बनाती है। (ख) मानवजनित कारण प्राकृतिक कारकों के साथ-साथ मानव गतिविधियाँ थार में मरुस्थलीकरण को और अधिक तीव्र बना रही हैं। अत्यधिक चारागाह उपयोग के कारण घास और अन्य प्राकृतिक वनस्पतियाँ नष्ट हो जाती हैं, जिससे मिट्टी खुली रह जाती है और पवन क्षरण बढ़ जाता है। कृषि उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुँचाता है और दीर्घकाल में उसकी उर्वरता घटा देता है। इसी प्रकार, भूजल का अत्यधिक दोहन सिंचाई और घरेलू उपयोग के लिए किया जाता है, जिससे भूजल स्तर निरंतर नीचे गिरता जा रहा है। इसके अलावा, अनुपयुक्त कृषि तकनीकें, जैसे निरंतर एक ही फसल की खेती, भूमि को परती न छोड़ना और परंपरागत जल-संरक्षण पद्धतियों की उपेक्षा, भूमि के क्षरण को और अधिक बढ़ाती हैं। इन सभी मानवीय कारणों ने थार रेगिस्तान में मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को तीव्र और व्यापक बना दिया है। 4.3 मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया क्रमिक होती है और इसमें कई परस्पर जुड़े चरण शामिल होते हैं। सर्वप्रथम, वर्षा की अनियमितता और कमी के कारण भूमि की नमी घटने लगती है। नमी के अभाव में प्राकृतिक वनस्पति का विकास बाधित होता है और धीरे-धीरे पादप आवरण का क्षय होने लगता है। जब भूमि से वनस्पति हट जाती है, तो मिट्टी सीधे पवन और तापमान के प्रभाव में आ जाती है, जिससे मृदा क्षरण और विघटन की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप ऊपरी उपजाऊ मिट्टी उड़ जाती है और भूमि की उत्पादकता घट जाती है। अगले चरण में, वायुप्रवाह द्वारा रेत का संचलन होता है, जिससे नए रेत-टीले बनते हैं और पुराने टीले आगे बढ़ते हैं। यह स्थिति कृषि भूमि, जल स्रोतों और मानव बस्तियों के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न करती है। अंततः, भूमि में जैविक क्रियाओं का उलटाव हो जाता है, जिससे मिट्टी में जैविक पदार्थों और पोषक तत्वों की मात्रा कम हो जाती है और भूमि स्थायी रूप से अनुपजाऊ हो जाती है। 5. मरुस्थलीकरण के प्रभाव 5.1 पर्यावरणीय प्रभाव मरुस्थलीकरण का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप जैव विविधता में निरंतर गिरावट आती है, क्योंकि वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल आवास नष्ट हो जाते हैं। कई स्थानीय प्रजातियाँ या तो लुप्तप्राय हो जाती हैं या क्षेत्र छोड़ने पर मजबूर होती हैं। इसके अतिरिक्त, मृदा क्षरण की समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है। रेत-टीले बढ़ते जाते हैं और उपजाऊ भूमि सिकुड़ती जाती है। जल संरक्षण की क्षमता घटने से जल स्रोतों का संकुचन होता है और भूजल स्तर लगातार नीचे जाता है, जिससे जल संकट गहराता है। 5.2 सामाजिक–आर्थिक प्रभाव मरुस्थलीकरण का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मानव जीवन और अर्थव्यवस्था को भी गहराई से प्रभावित करता है। कृषि योग्य भूमि के घटने से कृषि उत्पादन में गिरावट आती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर संकट उत्पन्न होता है। पशुपालन और कृषि पर निर्भर ग्रामीण परिवारों की आजीविका संकट में पड़ जाती है। रोजगार के अवसर सीमित होने के कारण लोग आजीविका की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगते हैं, जिससे सामाजिक असंतुलन और शहरी दबाव बढ़ता है। 6. मरुस्थलीकरण की रोकथाम एवं समाधान थार रेगिस्तान तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण को नियंत्रित करने के लिए समन्वित और दीर्घकालिक रणनीतियों की आवश्यकता है। 6.1 भूसंरक्षण उपाय भूसंरक्षण के अंतर्गत स्थिर पादप आवरण का विकास अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए वृक्षारोपण, झाड़ियों और स्थानीय शुष्क-प्रतिरोधी पौधों की खेती को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे पवन क्षरण को रोका जा सके। इसके साथ ही, बंजर और निम्न-भूमि क्षेत्रों में तटीय अवरोध एवं बालू-नियंत्रण संरचनाएँ बनाकर भूमि को सुरक्षित किया जा सकता है। 6.2 जल संरक्षण तकनीकें जल संरक्षण मरुस्थलीकरण रोकथाम की आधारशिला है। पारंपरिक पिठभारी जल संरक्षण संरचनाएँ, जैसे कुंड, तालाब और तहखाने, वर्षा जल को संचित करने में सहायक हैं। आधुनिक तकनीकों में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग जल की बचत करता है और भूमि की नमी बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है। 6.3 सामाजिक–आर्थिक हस्तक्षेप (विस्तारित विवेचन) मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए सहकारी कृषि प्रथाओं को प्रोत्साहन देना आवश्यक है, जिससे संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके। इसके साथ ही, स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने हेतु शिक्षा एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता है। सरकारी योजनाओं का प्रभावी एवं ईमानदार क्रियान्वयन, स्थानीय सहभागिता के साथ, मरुस्थलीकरण नियंत्रण की दिशा में एक सशक्त कदम सिद्ध हो सकता है। 7. निष्कर्ष उपरोक्त अध्ययन के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि थार रेगिस्तान केवल राजस्थान का एक स्थिर भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक गतिशील एवं संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र है, जिसका विकास प्राकृतिक शक्तियों और मानव गतिविधियों के निरंतर पारस्परिक प्रभाव से हुआ है। थार का भू-आकृति विज्ञान—जिसमें रेत के टीले, इंटरड्यूनल मैदान, शुष्क नदी-घाटियाँ और पवन-निर्मित संरचनाएँ सम्मिलित हैं—इस क्षेत्र के दीर्घकालिक भू-गर्भीय इतिहास और जलवायु परिवर्तन की सशक्त अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है। इस शोध से यह भी स्पष्ट होता है कि थार रेगिस्तान में मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया केवल प्राकृतिक कारणों तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवजनित गतिविधियों ने इसे और अधिक तीव्र तथा व्यापक बना दिया है। अल्प एवं अनिश्चित वर्षा, उच्च तापमान और तीव्र पवनों जैसी प्राकृतिक परिस्थितियाँ जहाँ भूमि को पहले से ही नाजुक बनाती हैं, वहीं अत्यधिक चारागाह उपयोग, भूजल का अंधाधुंध दोहन, अनुपयुक्त कृषि तकनीकें और वनस्पति आवरण का क्षय इस समस्या को और गंभीर रूप प्रदान करते हैं। इसके परिणामस्वरूप पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है, कृषि उत्पादन घटता है, जल संकट गहराता है और स्थानीय जनसंख्या की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। थार क्षेत्र में मरुस्थलीकरण के प्रभाव केवल पर्यावरणीय स्तर तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनके सामाजिक और आर्थिक आयाम भी अत्यंत गहरे हैं। कृषि और पशुपालन पर निर्भर ग्रामीण समुदायों की आजीविका संकट में पड़ जाती है, जिससे पलायन, गरीबी और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार, मरुस्थलीकरण को एक समग्र सामाजिक–आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखना आवश्यक है। अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि मरुस्थलीकरण की रोकथाम के लिए केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए रणनीतिक योजना, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उपागम, और सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों तथा स्थानीय समुदायों के समन्वित प्रयास अनिवार्य हैं। वृक्षारोपण, भूसंरक्षण, जल संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान का पुनर्जीवन और सतत कृषि पद्धतियों को अपनाकर ही इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। अंततः यह कहा जा सकता है कि थार रेगिस्तान का संरक्षण और संतुलित विकास न केवल राजस्थान, बल्कि सम्पूर्ण देश के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा हुआ है। मरुस्थलीकरण की समस्या को यदि समय रहते वैज्ञानिक समझ, सामाजिक सहभागिता और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ संबोधित किया जाए, तो थार रेगिस्तान को एक सतत और संतुलित पारिस्थितिक क्षेत्र के रूप में संरक्षित किया जा सकता है। संदर्भ सूची (References / संदर्भ सूची) 1. अग्रवाल, ए. एवं नारायण, एस. 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| Keywords | . |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 17, Issue 2, Array 2026 |
| Published On | 2026-02-07 |
| Cite This | थार रेगिस्तान: राजस्थान में भू-आकृति विज्ञान और मरुस्थलीकरण — एक भौगोलिक अध्ययन - Sharvan Kumar Meena - IJTAS Volume 17, Issue 2, Array 2026. |
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