International Journal of Technology and Applied Science
E-ISSN: 2230-9004
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Volume 17 Issue 10
October 2026
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West Management, Rural Livelihoods, and Circular Economy in the Mountainous Regions of Uttarakhand: A Geographical Study of Sustainable Development.
| Author(s) | Dr. Nandi Gariya |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | हिमालयी भू-भाग में अवस्थित उत्तराखण्ड एक पर्वतीय राज्य हैं, जहॉं ग्रामीण समुदाय की आजीविका प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष ़रूप सें वन संसाधनों पर प्राचीन से अद्यतन निर्भर हैं। ईधन,चारापत्ती, लकडी और गैर काष्ठ वन उत्पाद तथा विभिन्न जैविक पदार्थ ग्रामीण जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। ग्रामीण दिनचर्या में वन संसाधनों के उपयोग में वृक्ष पातन लकडी, चारा पत्तियॉं, वृक्ष शाखाऐं छाल एवं वृक्ष लताओं के अवशेष, कृषि वानिकी अवशेष, तथा अन्य जैविक पदार्थ सामान्यतः वन अवशिष्ट के रूप में पहचाने जाते हैं। प्राथमिक व्यवस्था के रूप में ग्रामीण समाज अपनी अर्थव्यवस्था संचालन हेतु ग्रामीण परिवेष के वनों से उक्त वनोपज सामग्रियों का संग्रहण करके अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ करते हैं। ग्रामीण प्रति परिवार आजीविका संबर्द्वन में वनोंपज सहित वन अवशिष्ट पदार्थो का बहुत महत्व हैं। जहॉं ग्रामीण समाज प्राथमिक अर्थव्यवस्था कृषि संलग्न पशुपालन में मुख्यतः कार्यरत रहते हैं वहीं इन कार्यो को संपादित करने के लिए वन अवशिष्ट एवं वनोपज पर निर्भरता बनी रहती हैं। दूसरी ओंर अध्ययन में यह भी आवश्यक है कि यदि वन अवशिष्ट पदार्थो का उचित प्रबन्धन नही किया जाय तो इन क्षेत्रों में वनाग्नि जोखिम, मृदा व जल प्रदूषण, अवशिष्ट प्रजातियों का विस्तार तथा पारिस्थितिकी असन्तुलन का विस्तार दिखाई देता हैं। पर्वतीय ग्रामीण समाज के द्वारा वनोपज एवं वन अपशिष्टों के द्वारा अनेक महत्वपूर्ण कार्य जैविक अवशेषों का कम्पोस्ट खाद बनाना, हस्त शिल्प उद्योग का विकास, इकोटुरिज्म का विकास तथा अन्य मूल्य वर्धित हथकरघा निर्मित उद्योग का विकास करके ग्रामीण आय और रोजगार के नये अवसर उत्पन्न किए गये हैं। इस विषय पर अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में वन अपशिष्ट के प्रमुख श्रोतो की पहचान करना तथा इसका ग्रामीण परिवारों की आजीविका में योगदान ज्ञात करना, ग्रामीण महिलाओं की वन अपशिष्ट प्रबन्धन में भूमिका का अध्ययन करना हैं। मुख्यतः वन अपशिष्ट की प्रकृति उसका वर्तमान समय में उपयोग एवं प्रबन्धन, ग्रामीण आजीविका में उसके संभावित योगदान तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था के माध्यम से सतत विकास की संभावनाओं का विश्लेषण करना हैं। यह अध्ययन कार्य द्वितीयक ऑकडों के साथ-2 क्षेत्रीय सर्वेक्षण, साक्षात्कार एवं अवलोकन जैसी प्राथमिक शोध विधियों से सम्पन्न किया जायेगा। इस अध्ययन से स्पष्ट होता हैं कि वन अपशिष्ट को साधन के रूप में उपयोग करके संसाधनों का निर्माण करना, ग्रामीण रोजगार, महिला सहभागिता, उर्जा सुरक्षा तथा पर्यावरण संरक्षण को बढावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सतत विकास संभव किया जा सकता हैं और रोजगार व आय अर्जन के श्रोतों को सतत करके पलायन, गरीबी, बेरोजगारी को कम किया जा सकता हैं। भारत गॉंवों का देश हैं। यहॉं उर्जा प्राप्ति से लेकर रोजगार तक प्रकृति की प्राकृतिक धरोहर पर ही समग्र जैव जगत की निर्भरता हैं। इसका संरक्षण, संबर्द्वन ग्रामीण समाज के साथ-2 देश के नियोजन कर्ताओं के रूप में सरकारी एवं गैरसरकारी विभागों द्वारा भी चिन्तन, मनन करने के साथ-2 क्षेत्रीयता को प्रदूषण मुक्त सतत विकास के रूप में भी रखना हैं। वन अपशिष्ट प्रबन्धन एवं ग्रामीण आजीविका को निम्न पंक्तियों के द्वारा स्पष्ट किया गया हैं- वन हैं प्रकृति का अमूल्य उपहार, वन अपशिष्ट से बढे ग्रामीण रोजगार पुनर्चक्रण से संसाधन बचाऐं, सतत विकास की राह बनाऐं |
| Keywords | Residues, Rural Livelihoods, Circular Economy,Sustainable Development, Mountainous Regions, None-Timber Forest Products(NTFPs), Uttarakhand. |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 17, Issue 10, October 2026 |
| Published On | 2026-10-22 |
| DOI | https://doi.org/10.71097/IJTAS.v17.i10.1448 |
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